(छायाचित्र-हैदराबाद विश्वविदयालय परिसर)
हमारे हैदराबाद विश्वविद्यालय में जैसे अन्य जानवर रहते हैं, वैसे ही बहुत सारे कुत्ते हैं । यूँ तो कुत्तों की कोर कमेटी उन्हें इन्सान कहा जाना गाली मानती है । अब आप कहेंगें कि भाई तुम्हें कैसे पता कि वो क्या मानते और कहते हैं, क्या तुम उनकी बोली समझते हो, हो सकता है समझता हूँ । लेकिन जब उनकी किसी गलती पर उन्हें कुत्ते कहा जाए तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है, और वो अपने इस अच्छे लगने का इज़हार उस चीज़ को हिलाकर करते हैं, जो इन्सानों के पास होती नहीं है या फिर नज़र नहीं आती, जिसे पूँछ भी कहा जाता है । वैसे ये कुत्ते किसी को काटने का कोई भी किस्सा न इतिहास में है और न भविष्य में इसके घटित होने की संभावना नज़र आती है । इसका कारण है दोनों में अगाध प्रेम, अपनत्व...कई बार चुम्मा - चाटी आदि आदि...। अब इन्सान उनके गुण तो नहीं ले सका, लेकिन कुत्तों ने इन्सानों के
भी बहुत सारे गुण सीख लिए...‼ जैसे ये अभी भी फैका हुआ खाना नहीं खाते, या केक भी इन्हें हाथों से खिलाना पड़ता है । खैर । इन्सानों ने इन्हें कभी खाद्यान्न की कमी नहीं होने दी ।
वैसे इनमें भी इन्सानों ने कैटगरी बना दी है, वैसे इसे कोई कानून भले ही न मानता हो, लेकिन कुत्तों ने इसे लगभग स्वीकार कर लिया । कुछ कुत्ते कुछ मनुष्यों लोगों के ही प्रेम के पात्र हैं । जैसे बहुत सारे बालों वाले कुत्तों को लड़के पसन्द करते हैं, पूरे तौर पर या कोई एक पूरा रंग होनेवाले कुत्तों को ही यहाँ अधिक पसन्द किया जाता है । मिले जुले रंग या एक से अधिक रंगवाले कुत्तों को यहाँ अधिक पसन्द नहीं किया जाता है । इसका नतीजा यह हुआ कि कुत्तों ने भी अपने में एक व्यवस्था बना ली । एक कैटगरी उत्तर कैम्पस और दक्षिण कैम्पस को लेकर बनी । दूसरी रंग की एकता या अनेकता को लेकर बनी ।
शॉपिंग कॉम्पेक्स का गुट, गोप्स (इन्सानों के खाना खाने की जगह) वाला गुट, पुस्तकालय और रीडिंग रूम का गैंग, उसके बाद सबकैटगरीज़ में हर हॉस्टेल के मेस वाला अलग गुट था । इसमें भी शॉपकॉम पर विशिष्ट कुत्ते रहते थे, गोप्स वाले भी विशिष्ट ही थे, लेकिन उन्हें बचा हुआ खाना ही खाना पड़ता था । बाकी कुत्ते इन दो कैटगरीज़ पर इसलिए कुढ़ते रहते थे कि उन्हें केक, काजूवाले बिस्किट, विभिन्न प्रकार के पफ और तो और कभी-कभी मीठा पान तक खाने को मिल जाता था । सबसे बेचारी कैटगरी मेस (मनुष्यों का सार्वजनिक भोजनालय) के पीछे वाले कुत्तों की होती थी । देश के प्रत्येक सार्वजनिक स्थानों की तरह इन बेचारों को भी हर मौसम की मार झेलनी पड़ती थी । इससे भिन्न एक कैटगरी साँकल में बँधी कुत्तों की है, जो प्रोफ़ेसरान-कार्यालयीन इन्सानी कर्मचारियों के बिस्तरों पर सोती है, इन्हें कैम्पस के अन्य कुत्ते इन्सान कहते हैं । कुत्तों के अनुसार उनका मानुषीकरण हो गया है ।
इन सारी कैटगरियों के कुत्तों में हमारी कहानी के नायक सबसे ऊँचे दर्जेवाले हैं और उनके ठीक नीचे वाले दर्जे में आती है नायिका । क्यो? अरे भई नायिका हमेशा नायक से नीचे के ही दर्जे में आती है, विश्वास नहीं होता? अब आपने संस्कृत काव्यशास्त्र या महाकाव्य-नाटक नहीं पढ़े हैं तो इसमें मेरा क्या दोष है !! अब इतनी पीढ़ियों से इन्सान का पालतू होते-होते कुत्तों ने भी इसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है । खैर । हमारा नायक है फिलिप और नायिका का नाम है काजल । ना...ना....ना...ये दोनों एक दूसरे से प्रेम नहीं करते हैं । इन दोनों में कोई खलनायक (विलेन) भी नहीं है । दोनों एक ही गुट के सदस्य हैं । बस इतना ही सम्बन्ध है दोनों का । शॉपकॉम वाले सबसे बेटर कैटगरी के अन्दर ये आते हैं, खूब प्यार पाते हैं और खूब प्यार बाँटते हैं ।
फिलिप तो अंग्रेजी बचपन से ही सीख गया था । काजल हिन्दी बहुत बेहतर जानती थी, और तोड़ी बहुत तेलुगू भी । जब से नारीवाद ने कैम्पस के इन्सानों में प्रवेश किया, तब से काजल की ओर विशेष ध्यान दिया जाने लगा था । इस बात का बराबर ध्यान दिया जाता था कि उसे भी फिलिप के बराबर प्यार और इन्सानी अन्न के विभिन्न प्रकार मिले । काजल की जिन्दगी अब उतनी ही बेहतर हो चली थी, जितनी कि फिलिप की । जब पेट का बेहतर इन्तजाम होने लगा और स्टेटस् भी मिलने लगी तो फिलिप को भी इसका अहसास होने लगा कि काजल अपने लिए एकदम फिट रहेगी ।
इससे फिलिप को तो प्यार हुआ और तीसरे को ही चिन्ता होने लगी । बेगानी शादी में हमेशा अब्दुला ही दिवाना ही क्यों होता है, पता नहीं ।
मानवीकरण की प्रक्रिया के तहत फिलिप ने काजल को प्रपोज़ किया होगा, वर्ना वे कई घंटों तक किसी इमारत के पीछे क्या करते ! तो प्यार परवान चढ़ रहा था । लेकिन इधर इस कहानी के अब्दुल्ला को खौफ़्त होने लगी । दरअसल हुआ यह कि एक तो काजल की इन्सानों में लोकप्रियता बढ़ने लगी और जब से वह फिलिप के साथ रहने लगी तो लोगों को उनकी जोड़ी खूब सुहाती, और वे लपककर उन्हें केक आदि खास-खास चीज़े खाने देते । जब तक यह स्थिति नहीं आयी थी तब तक अब्दुल्ला साहब प्यार और खाने की प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर थे, लेकिन अब उनके ग्राफ में अब तेज़ी से गिरावट आने लगी । उन्हें खाने ही नहीं मिल रहा था । उन्हें भी अब निम्न मानीजानेवाली कैटगरी के कुत्तों के साथ मेस का बचा कुचा खाने पर मजबूर होना पड़ रहा था । वे चुप कैसे रहते, उन्होंने तय किया कि इस प्रश्न को कोर कमेटी (ACDCC) के सामने प्रस्तुत करे । उन्होंने कमेटी की मीटिंग बुलाई ।
तय भारतीय समय के अनुसार एक-दो तो कोई चार घंटे की देरी से सारे सदस्य जमा हो गए ।
“देखो भाई, हमारे यहाँ चालीस-पैंतालीस सालों से जो सिस्टम चला आ रहा है, उसे बदला नहीं जा सकता ।” – अब्दुल्ला ने गंभीर मुद्रा में कहा और सब उतनी ही गंभीर मुद्रा से सुनने लगे थे । कुछ लोग इन बातों पर ध्यान न देकर अपनी अलग ही गपशप में व्यस्त थे । व्यस्त रहनेवालों में साउथ कैम्पस ग्रुप की कुछ छोटी-छोटी कुतिया और कुछ बूढ़ी कुतिया थी ।
“तुम्हें पता है, इसके बाल कितने मुलायम हैं, ये जब बारिश में भीगकर अपने बाल झाड़ता है न, तो बिल्कुल अक्षय कुमार लगता है ।” काली पूँछकटी सुरैय्या ने आहें भरते हुए कहा ।
“अरी ऐसा न बोल, उसे बुरा लग जाएगा इन्सान के साथ उसकी बराबरी करो तो, वैसे वो अक्षय कुमार लगता है नहीं.... लगता था, अब तो अमरिश पुरी लगता है..... ।” लता ने खिलखिलाते हुए अपना वाक्य समाप्त किया ।
जब भी इस खुसर-पुसर की ओर ध्यान जाता तो अब्दुल्ला के तलवों की आग पेशानी पर चढ़ जाती । उसने सोचा पिछले कई दिनों से कुत्तों की संस्कृति भ्रष्ट हो रही है । वो इसके लिए युवाओं से अधिक वृद्धों को जिम्मेदार मानता आ रहा था । उसके अनुसार वृद्धों ने अपने युवाओं को ज्यादा आज़ादी देकर उन्हें बिगाड़ दिया है । उसे याद है, इसी संस्कृति के चलते उसने और उसके साथियों ने इन्सानों के साथ सह-अस्तित्व बनाया था । लेकिन इन्सान भी ऐसे ही होते चले गए हैं कि संस्कृतिविहीन कुत्तों को ही अधिक पसन्द करने लगे हैं । लेकिन एक अच्छा नेता होने के नाते उसे हमेशा लगता था कि प्राचीन संस्कृति को बचाए रखे, जो उसे दादा-पिता से मिली थी । उसे पता था कि एक दिन वो ऐसा करने में कामयाब होगा । उसे इस बात का पता है कि उसकी संस्कृति में इन्सानों को काटना नहीं था और इसे इन युवाओं ने भी स्वीकार किया है । उसे याद है कि उनके इन मूल्यों से जलकर बाहर के कुत्तों ने उनके कैम्पस के पिछले दरबाजे से ज़बरदस्ती घुसकर इन्सानों को काट लिया था, ऐसे आपातत्काल में प्रशासन ने उन्हें ही पकड़ने की मोहिम चला दी थी और उन्हें कई दिनों तक गायब होना पड़ा था । इस स्थिति से उसकी संस्कृतिनिष्ठता ने उन्हें फिर से अपनी साख़ बनाने में काम आयी थी । लेकिन आज के युवा खुल्लम खुल्ला प्रेम करते हैं, किसी भी कैटगरी में प्रेम करते हैं, एक से दूसरी कैटगरी में जाते हैं, और कैटगरियों को मानते ही नहीं है ।
अपनी इन चिन्ताओं को अब्दुल्ला बताए जाता था, किन्तु शायद ही कोई सुन रहा होगा । लेकिन ऐसे भी कुत्ते थे जो अब्दुल्ला को सिरियसली लेते थे, और अब्दुल्ला इस बात को जानता था । उसे मीटिंग खत्म होने की घोषणा कर उन विशेष लोगों से मिलने का प्लान बनाया । उसने इन लोगों से मिलकर एक ऐसी टीम बनाई जो युवाओं को संस्कृति की तरफ लौटाए और बनी हुई व्यवस्था का पालन करे । उन्होंने अपना प्रचार शुरु किया । इस दौरान उन्हें एक दिन मेस कैटगरी वाला सदस्य कहीं और खाता हुआ दिखा । उन्हें अलग-अलग कैटगरी वाले महिला-पुरुष सदस्य साथ दिखे । पहले तो उन्होंने उन्हें समझाने का प्रयास किया फिर उन्हें पीट दिया । इससे युवाओं के साथ-साथ वृद्धों में भी हड़कंप मच गई । युवा इन्क़लाब पर उतारु थे तो वृद्ध उन्हें समझाने में व्यस्त । वे जानते थे कि अब्दुल्ला शक्ति से अधिक युक्ति के द्वारा समुदाय और कैम्पस से बाहर निकलवा सकता है । कईयों को लगता था कि ऐसा पहली बार हुआ है कि समुदाय में विभाजन हुआ । उन्हें इस बात का भी इल्म था कि यह विभाजन इसलिए नहीं हुआ था कि उन्होंने कई विभाजनों को स्वीकार कर लिया था ।
इसके खिलाफ जो भी प्रतिक्रिया करता, उन्हें कुचल दिया जाता । अब्दुल्ला अण्ड कंपनी अघोषित रूप से संसद-न्यायपालिका और मंत्रिमंडल सब बनकर राज कर रही थी । इस दौरान उन्होंने कई घटनाएँ की । उधर दूसरा पक्ष भी लगभग मान चला था कि अब इस सत्ता को चुनौती देना असंभव है । उन्होंने इस तानाशाही को स्वीकार कर लिया था । और इस राज के कई दिन बीत गए ।
कई दिन मतलब कई दिन, कितने दिन पता नहीं । और इतने दिन बहुत ही गुप्त रूप से काजल-फिलिप मिलते थे । एक शाम जब शॉप-कॉम पर इन्सानों की भीड़ थी । कई इन्सान दो नर-मादा इन्सान साथ नहीं दिखते तो, उन्हें अधिक चिन्ता होती है, लेकिन कुत्तों की क्या चिन्ता । बेचारों को मिलाने के लिए इन्सान क्या कुछ नहीं कर सकते थे, लेकिन उन्हें तो अपने ही प्रपंच से फुरसत कहाँ ‼ हर शाम की तरह यहाँ कई इन्सान खा (पी) रहे थे । इसमें उनके प्यारे कुत्ते भी थे । फिलिप और काजोल के मास्टर प्लान की ख़बर अब्दुल्ला को पहले ही हो चुकी थी । उसने अपने साथियों के साथ स्पेशल टास्क फोर्स भी कैम्पस के बाहर से बुला ली थी । वे लोग अपने साथियों के साथ पहले ही घात लगाए बैठे थे । ऐसे में उन्होंने देखा कि बिल्कुल हीरो की तरह काजोल और लगभग उसी तरह फिलिप भी आने लगे हैं । वे साथ में निकल रहे थे कि अब्दुल्ला के एक साथी ने उन्हें मारने को गुस्से में लपकते हुए कहा - “साले इन्सान”
अब्दुल्ला ने उन्हें रोका, क्योंकि वो जानता था, इससे बढ़कर और भी ज्यादा होनेवाला है । और वो यह भी जानता था कि उसका इस प्रकार खुले तौर पर इस प्रेमयुगल पर आक्रमण करने पर कुत्ता कोर कमेटी में उससे इस बारे में सवाल पूछा जाएगा । उसने अपने बाहरी साथियों को कुछ देर रुकने का इशारा किया ताकि सही मौका मिले । और फिलिप-काजोल उस कार्य में जुट गए, जिसे देखकर इन्सानों ने भी अपनी गर्दनें घुमा ली । वह प्रकृति की उस क्रिया को खुले आम करने लगे, जिसे इन्सान भी नहीं करते । उन्होंने कुत्तों के सारे सांस्कृतिक नियमों को उस रूप में धत्ता बताकर प्रेम की अबाध घोषणा कर दी । यह क्रिया समाप्त होने ही वाली थी कि अब्दुल्ला ने अपने साथियों को लगभग उसी मुद्रा में आक्रमण का संकेत में आदेश दिया, जैसे सेनापति अपनी सेना को दिया करता है ।
कैम्पस नास्तिकों की बस्ती है और इसमें रहनेवाले घोर आस्तिक एक ही भगवान पर टिके हैं । वह प्रेम से नफरत करते हैं । यदि वह प्रेम से नफरत नहीं करते, तो उस टीले पर नास्तिकों द्वारा दफ़नाए गए फिलिप-काजोल की कब्र पर भी एखाद बार सजदा जरूर कर लेते । वैसे वहाँ आज-कल इन्सान उस द्रव्य का सेवन करते हैं, जिसे उनकी परम्परा में मदिरा कहा जाता है । अब्दुल्ला ऑल कैम्पस डॉग कोर कमेटी का अध्यक्ष है, जिसका नाम बदलकर विश्वविद्यालय श्वान समिती कर दिया गया है । उसे बाहर के भी उन कॉलोनियों से अब समर्थन मिलने लगा है, जहाँ जाना उसके लिए मना था । कैम्पस में कोई कुत्ता सर उठाकर नहीं चलता, एक इन्सान के शेर का सहारा लेकर कहा जाए तो – चली है रस्म यहाँ कि कोई सर उठाकर न चले ।