12 November 2014

गाँव, सहअस्तित्व और खेल


बचपन की यादों से एक रोमांच सा भर जाता है देह में । जैसे अन्य बातों में अन्तर है, उसी तरह और उन्हीं कारणों से गाँव और शहर के बचपन में अन्तर है । शहर जैसे घरों-गाडियों के कारण ही नहीं, शहरी मानसिकता के कारण गाँव वह गँवारपन भी खोता जा रहा है, जो उसकी शान तो था, लेकिन शहरी जिसका गाली की तरह प्रयोग करते थे – गँवार या गँवारू कहकर । टीवी, गाडियाँ, कुछ घरों में कम्पूटर या कुछ हाथों में मोबाईल (कुछ कुछ स्मार्ट) आ जाने से गाँव जरूर बदले हैं, लेकिन बहुत सी बातें अभी भी वैसी ही हैं । मैं गाँव जाता हूँ तो अब वह सबकुछ नहीं करता हूँ, जो किया करता था । लेकिन देखता हूँ मेरे मामाजी के लड़के अपने दोस्तों के साथ मिलकर वही सब करते हैं । वो अब भी सुबह चार-पाँच बजे जग जाते हैं । अभी भी वे घर में टीवी छोड़कर अपने दोस्तों के घर क्रिकेट का मैच देखते हैं । अब भी वे हर रविवार रेल्वे ट्रैक से सटी जगह को क्रिकेट खेलने के लिए साफ करते हैं और उसके बाद कबड्डी खेलकर मिट्टी से सना अपना शरीर तालाब में भैंसों के साथ छोड़ देते हैं । भैंसों की पूँछ पकड़कर तैरना सीखते हुए वे उस पर चढ़ जाते हैं । मैं देखता हूँ वह टेलिफोन का खंभा मोबाईल टावर्स को धत्ता बताते हुए अभी भी उस तालाब के बीचो-बीच खड़ा है, जिस पर चढ़कर पानी में कूदने की हम शर्त लगाया करते थे, जिसकी अब हिम्मत नहीं रही । लेकिन उस खंभे पर अब कोई तार नहीं बचा है, अकेला तनहा खंभा अब संदेशों का वाहक नहीं रहा ।
           मामी सुबह चार बजे जग जाती है, रोटी, सब्जी और घी बनाते हुए उसकी फुर्ती बताती है कि वह कम-से-कम मन से तो कभी नहीं थकती । चूँकि हमारे गाँव में नाश्ता (ब्रेकफास्ट) का अभी भी चलन नहीं है, इसलिए सुबह छ-सात बजे उठकर मामाजी दो-तीन ज्वारी की रोटियाँ (जो बीसेक फुलकों के बराबर होते हैं) साफ कर जाते हैं । इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उनके बच्चे कितना कम खाते होंगें । अब तक तो मामी खेत जा चुकी होती है । ये मेरी समझ में अभी तक नहीं आया कि जब रोटी चुकी होती है, तो वह क्यों नहीं अपने साथ खेत ले जाती है । दोपहरिया होते-होते बच्चे निकलते हैं अपने माता-पिता को खेत में रोटी पहुँचाने । बच्चे किसी सवारी पर नहीं निकलते, बल्कि सायकल के टायरों को बेहया के डंठल से मारते हुए चलाते हैं और मानों उसकी सवारी करते हुए खेतों तक जाते हैं । वापसी में उनके हाथों में गायों-भैंसों-बकरियों के लिए चारा होता है । शायद वे खाना पहुँचाने नहीं, खाना लाने गए थे । खाना उनके लिए जिन्होंने उन्हें अपने दूध से सींचा है ।
          अपनी माँ के जितने वे इन जानवरों के भी उतने ही कर्जदार होते हैं, जितने की उनके बछड़े-छौने । आह...वो बचपन का नहाना..। शहरों में बाथटब होता है । यहाँ गावों में माँ अपने बच्चों को एक बड़े से पतिले में बैठा देती हैं । जिसमें बैठकर बच्चा पानी में छपाक्-छपाक् करता रहता है । फिर होती है, सर की मालिश...। बच्चा बहुत छोटा हो तो नहाने से पहले मालिश, फिर सनबाथ और फिर वाटरबाथ । आह...कितने सुहाने दिन होते हैं । सुबह में दही रोटी तो रात में घी भात । दोपहर भर खेत से आई हुई मुँगफलियाँ, बेर, अमरूद, गन्ने, मुंग की फल्लियाँ, अरहर की फल्लियाँ, लाल-लाल टमाटर, हरे चने के डंटहल और न जाने क्या-क्या । मुझे अचरज तो इस बात का लगता है कि हल को अपने कंधे पर खींचकर ले जाने वाला बैल आठ-दस साल के बच्चे के रस्सी थामने पर उसके पीछे-पीछे कैसे चलता है । अपने में कई सभ्यताओं को निगलजानेवाली धरती का सीना एक अदना सा बीज कैसे चीरकर बाहर निकलता है ‼ कैसे गाय-भैंस अपने बच्चों के हिस्से का दूध इन्सान के बच्चों को निर्मोह भाव से ले लेने देती है । कैसे दिन भर काम करने के बाद मामी अभी भी गाय-बैलों का साना-पानी अपने परिवार वालों से पहले करती है । कैसे सालभर का हिसाब-किताब मामाजी की जुबाँ पर चढ़ा रहता है ‼
          पैदा होते ही बछड़ा कितना कूदता है, क्या ये बच्चे भी ऐसा ही नहीं करते ? हमारे गाँव में एक ऐतिहासिक खेल खेला जाता है, जिसका कोई लिखित-मौखिक इतिहास  उपलब्ध नहीं है । उसे कहते हैं – डफ । एक खेल का एक सदस्य अपनी एक टाँग उठाकर एक लकड़ी दूसर फेंकता है, दूसरा उसे दौड़कर लाकर पेड़ के नीचे बने हुए एक घेरे में रखता है । तब तक दस-पाँच बच्चे  पेड़ पर चढ़ जाते हैं और वह लकड़ी लानेवाला बच्चा पेड़ पर चढ़कर जिसे छू लेता है, अगली बार उसे लकड़ी लाने के लिए दौड़ना पड़ता है...लेकिन यदि पेड़ पर चढ़नेवालों में से कोई किसी भी टहनी से उतरकर या पेड़ से कूदकर उस लकड़ी को जमीन पर बने घेरे के बाहर लकड़ी को निकालता है, तो उसी लड़के को फिर से लकड़ी लाने के लिए दौड़ना पड़ता है । इस खेल में कई बच्चे अपने हाथ-पैर तोड़ लेते हैं । ऐसों का ईलाज करते हैं, गाँव के हकीम । टूटे हुए हाथ या पैर को पैंतालिस दिनों तक बाँस से कस दिया जाता है । अब वैसे डॉक्टर आ गए हैं, जो प्लास्टर कर देते हैं ।
इस मामले में लड़कियाँ भी कम नहीं हैं, वे लिगोर्चा नामक खेल खेलती हैं और अपने-आप को जख्मी कर लेती हैं । इसमें होता यह है कि जमीन पर बने घेरे में चार-पाँच छोटे-छोटे पत्थरों को एक-के-ऊपर-एक रखा जाता है । तय दूरी से एक कपड़े से बनी गेंद से उसे गिराया जाता है । गिराने के लिए एक टीम के सदस्य को तीन-तीन मौके मिलते हैं, यदि पहली टीम नहीं गिरा पायी तो दूसरी टीम । जब ये पत्थर गेंद से गिर जाते हैं, तो उसे उसी टीम को उसी घेरे में सजाना पड़ता है, किन्तु इसने में आगे वाली टीम उसी कपड़े की गेंद से उन्हें पीटती है और पत्थरों को जमाने नहीं देती हैं ।
लड़कों का एक और खेल था, जो गर्मियों की छुट्टियों में खेला जाता था । जिसे पत्ते कहा जाता है । माचीस की डिबिया को ऊपरी और नीचले भाग से यह पत्ते बना करते हैं । इस खेल में हर सदस्य तय मात्रा में अपने-अपने पत्ते मिलात है, जिसे जमीन पर बने घेरे में रकखर मिट्टी से पूरी तरह ढँक दिया जाता है । फिर तय दूरी से पत्थर द्वारा उस मिट्टी के ढेर को चीरते हुए पत्तों को उस घेरे से बाहर निकालना होता था । एक बार में जितने बाहर हुए वह सारे उसी के । इसके बाद दूसरा सदस्य । कंचे और गिल्ली-डंडा भी हमारे यहाँ जमीन पर घेरा बनाकर ही खेला जाता है । मेरी समझ में अभी तक नही आ पाया कि लगभग सारे खेलों में जमीन पर घेरा ही क्यों बनाया जाता होगा, या कि जमीन पर ही क्यों ?
          वैसे इन खेलों में जेंड़र उतना मायने नहीं रखता । लड़कियों की अपनी कबड्डी की टीमें हुआ करती हैं, लेकिन एक उम्र तक ही । बाकी खेलत तो वे शादी के बाद तक भी खेलती हैं । बच्चों-गिरस्ती से समय मिले तो ।
अब शहरों के लोग फर्श से जमीन को ढँक देते हैं, तो उनके बच्चे कहाँ खेलेंगें ये सारे खेल । वो तो व्हीडिओ गेम ही खेलेंगे न? वे और उनकी वर्च्युअल दुनिया...हम और हमारी जमीनी दुनिया का बचपन..बस यहीं तक । बाक़ी खेलों की यादें और कभी...

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