15 October 2018

विधा क्या है?

१ . विधा क्या है?
सामान्यतः शैली, विषय-वस्तु, कथन-प्रकार, छान्दसता आदि के आधार पर किए गए साहित्य के प्रकारों को विभिन्न शैलियों में विभाजित किया गया है । आधुनिक समय में शैलियों के भीतर शैलियों का विकास होने के कारण यह पैमाना अब अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है । उसी प्रकार गद्य-पद्य में अन्तर अथवा काव्य के आपसी प्रकारों में आवाजाही के बढ़ने  से विषय-वस्तु अथवा कथन प्रकार भी पैमाने के रूप में नहीं अपनाए जा सकते हैं । कोई आसानी से कह सकता है कि विधा के रूप में काव्य छन्दबद्ध होता है और गद्य नहीं; किन्तु इस विचार में भी अपूर्णता है, क्योंकि अब काव्य के लिए आवश्यक नहीं कि वह छन्दबद्ध हो और यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि गद्य का कोई छन्द नहीं होता है । यह सब छन्द की व्याख्या पर निर्भर करता है । केवल मात्राओं को गिनकर ठीक बैठाना छन्द नहीं होता । लयात्मकता छन्द का प्राण होती है और वह मात्राओं अथवा गद्य-पद्य पर आश्रित नहीं होती है । विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' कम लयबद्ध नहीं है, इसके विपरित मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ छन्दबद्ध होते हुए भी बातचीत लगती हैं । अतः छान्दसता विधाओं को अलग-अलग करने का कोई पैमाना नहीं है ।
तो ऐसी कौन-सी वस्तु है जो गद्य और पद्य को अथवा विभिन्न विधाओं को अलग-अलग करती है? हमें लगता है, सबसे पहले गद्य-पद्य में विभाजन के तौर पर 'विश्लेषण-संश्लेषण' को आधार बनाया जा सकता है । काव्य अपनी प्रकृति में अधिक विश्लिष्ट होता है । (यह बात कई विद्वानों ने पहले कही है, इसमें नया कुछ नहीं है ) और गद्य अधिक विश्लिष्ट अर्थात् विश्लेषण करनेवाली विधा के रूप में चिन्हित किया जा सकता है । वैसे यहाँ सामान्यीकरण से बचना चाहिए, क्योंकि गद्य और पद्य में यह विशेषताएँ अपना अतिक्रमण करते हुए भी सामान्य रूप से देखी जा सकती हैं, किन्तु इसे इन विधाओं की सामान्य  विशेषताओं के रूप में मान्यता दी जा सकती है । 
विधा विभाजन द्वारा साहित्य अध्यताओं एवं पण्डितों को अध्ययन में सुविधा होती है, पाठकों पर शायद ही कोई प्रभाव पड़ता हो । कहा जाता है इसे फ्रेंच शब्द 'जेनेरे' से अंग्रेजी में लिया गया, जिसका अर्थ मोटे रूप से 'प्रकार' होता है । 

२. विधाओं के प्रकार:
साहित्य को अनेक विधाओं में विभाजित किया जा सकता है, किन्तु इसे परम्परा के अनुसार तीन विभागों रखा गया है: 
भारतीय साहित्य चिन्तन में: अ) पद्य, आ) गद्य, और इ) चम्पू 
पाश्चात्य साहित्य चिन्तन में: ए) पद्य, बी) गद्य, और सी) नाट्य
भारतीय साहित्य चिन्तन में नाट्य को तब तक काव्य के ही भीतर माना गया जब तक नाट्य-संवाद पद्यमय रहे, जब वे गद्यमय हो गये तो नाट्य के विभिन्न प्रकारों को (काव्य-नाट्य अथवा गीती-नाट्य को छोड़कर) गद्य के भीतर माना जाने लगा । इस कारण भारतीय साहित्य चिन्तन में नाट्य को स्वतंत्र विधा के रूप में स्थान नहीं दिया गया है । चम्पू गद्य-पद्य के मिश्रित रूप को कहा गया है । 'गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते' (साहित्यदर्पण, ६ / ३३६ ) वर्तमान समय में गद्य-पद्य की विभाजन रेखा भी धुँधली हो गयी है।  वक्तृत्व एवं पाठन शैली अच्छी भली लयपूर्ण (छन्दबद्ध होना अनिवार्य नहीं है) कविता को गद्य बना सकती है और गद्य को काव्यमय रूप में प्रस्तुत कर सकती है । 

३ विधाओं की अनिवार्यता क्यों है?
जब छन्द का बन्धन टूट गया, तो विधाओं का बन्धन क्यों हो? वास्तव में साहित्य का लक्ष्य केवल उसका लिखा जाना या साहित्यकार का अभिव्यक्त होकर छप जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्य तब पूर्ण होता है, जब वे ठीक उन्हीं भावनाओं या विचारों को पाठक-श्रोता के बुद्धि एवं भावनाओं में उत्पन्न करने का प्रयास करता है, जो साहित्यकार अथवा लेखक-कवि के मन में उद्भुत हुए थे । ऐसे में विधाओं का बन्धन साहित्य को अधिक सम्प्रेषणीय बनाए रखने में सहायक होता है । यह विभाजन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए ही नहीं होता है, बल्कि साहित्यकार और पाठक के बीच बेहतर संवाद के लिए भी अनिवार्य होता है । 
कल्पना कीजिए 'गोदान' का होरी अचानक 'अन्धायुग' के प्रहरियों की भाँति पद्यमय संवाद बोलने लगे या फिर 'आधे-अधूरे' की सावित्री 'साकेत' की उर्मिला की भाँति अपने ही आँसूओं में नहाने लगे ! यह सही है कि इन रचनाओं की वैचारिक एवं भावनात्मक भूमि भिन्न है, किन्तु यह अन्तर विधाओं के कारण भी आया है, इस बात को भी ध्यान में रखना अनिवार्य है । जो विषय-वस्तु एक उपन्यास की होती है, वह एक कविता अथवा महाकाव्य की नहीं हो सकती है । 
विधाओं की अपना सामाजिक संबद्धता है । कई विद्वानों ने यह प्रश्न उपस्थित किया है कि आधुनिक काल में उपन्यास का उद्भव क्यों हुआ और महाकाव्य का अन्त क्यों हुआ? साहित्य-चिन्तक मानते हैं कि महाकाव्य सामन्ती समाज में ही लिखा जा सकता है और उपन्यास की रचना लोकतंत्र के अनुकूल है (और लोकतंत्र उपन्यास के) । इस तरह विधाओं के इतिहास को देखना केवल रूपवाद ही नहीं है, बल्कि उसके साथ साहित्य और समाज के अन्तर्संबंधों को भी परखा जा सकता है । 

४. साहित्य में विधाओं के उदाहरण:
अ) पद्य (पद्य के प्रकार होते हैं, उनके लिए अलग पोस्ट की जाएगी)
क) छन्दबद्ध: 
और देखा वह सुंदर दृश्य,
नयन का इद्रंजाल अभिराम। 
कुसुम-वैभव में लता समान,
चंद्रिका से लिपटा घनश्याम।

हृदय की अनुकृति बाह्य उदार,
एक लम्बी काया, उन्मुक्त। 
मधु-पवन क्रीडित ज्यों शिशु साल,
सुशोभित हो सौरभ-संयुक्त। (-जयशंकर प्रसाद, कामायनी श्रद्धा सर्ग)



ख) छन्दमुक्त/मुक्तछन्द
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। (निराला, तोड़ती पत्थर)

आ) गद्य: किसी भी भाषा में लिखित गद्य के प्रकारों से उदाहरण ।

इ) चम्पू: मैथिलीशरण गुप्त का 'यशोधरा' हिन्दी में चम्पू-काव्य का उदाहरण माना जाता है ।

ई) नाट्य (नाट्य के कई प्रकार होते हैं, जिनकी चर्चा अगली पोस्ट में)
हिन्दी के एक नाटक का दृश्य आप यहाँ देखकर इस विधा की प्रकृति का अन्दाजा लगा सकते हैं:हिन्दी नाटक कोर्टमार्शल का एक दृश्य

५. पॉप कल्चर में विधाएँ:
विधाएँ केवल साहित्य में ही नहीं होती हैं, बल्कि संगीत, मूर्तिकला आदि में भी विधाएँ होती है । जैसे संगीत में लोक, शास्त्रीय, जैज़, पॉप, भांगड़ा, लोवणी, पोवाड़ा, आदि कई कई प्रकार होते हैं । इसमें भी देशी-विदेशी का भेद किया जा सकता है, किन्तु उत्तर-आधुनिकता ने सब गड्ड-मड्ड कर दिया है । उसी प्रकार फिल्मों में सामाजिक, कामदी, त्रासदी, गीताधारित (म्यूज़िकल), नृत्यआधारित, ड्रामा, एक्शन आदि प्रकार की विधाएँ होती हैं । टेलीविजन के सिरियल्स में भी प्रकार होते हैं, यथा: ऐतिहासिक (शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान, टीपू सुल्तान आदि),   फैन्टसी (अलिफ लैला, नागिन जैसे), पौराणिक (रामायण, महाभारत, जय हनुमान, ओम् नमः शिवाय, देवों के देव महादेव आदि), पारिवारिक (अनगिनत उदाहरण), शैक्षणिक (कौन बनेगा करोड़पति जैसे ) ।
इसी प्रकार समाचारों के भी प्रकार या विधाएँ होती हैं । खेलों में भी विधाएँ होती हैं, टेस्ट क्रिकेट, एकदिवसीय, या २०-२० इसके उदाहरण हैं ।

No comments:

Post a Comment

स्वदेश दीपक

हिंदी साहित्य में स्वदेश दीपक का अलग मुकाम है । यह मुकाम उनकी वर्षों की साहित्य साधना का परिणाम है। स्वदेश दीपक ने बड़ी कुशलता से नाटक, कहा...